पापा जी

पापा जी
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“पापा जी आ रहे हैं, इसलिए ये सामान तो लाना ही पड़ेगा। घर की साफ-सफाई भी अच्छे से करवानी है। गाड़ी का नया डेकोरेशन भी कराना पड़ेगा। आखिर पापा जी पहली बार इतने दिनों के लिए आ रहे हैं। इसलिए उनके आवभगत में कोई कमी नहीं रहनी चाहिए।”

रमेश सुबह से ही तैयारियों में जुटा था। कभी बाजार जाने की सूची बनाता, तो कभी घर की साज-सज्जा का हिसाब लगाता। उसकी भागदौड़ देखकर मैं हैरान था।
आखिर मुझसे रहा नहीं गया तो पूछ ही लिया, “यार रमेश! तू सतयुग का बेटा कहाँ से पैदा हो गया? पापा जी के आने पर इतनी तैयारियाँ! आजकल तो लोग अपने माँ-बाप को पूछते तक नहीं और तू है कि उनके स्वागत में जमीन-आसमान एक किए हुए है!”

मेरी बात सुनकर रमेश के चेहरे का उत्साह अचानक फीका पड़ गया। उसने एक लंबी साँस ली, सिर झुका लिया और कुछ पल चुप रहने के बाद धीमी आवाज में बोला, “नहीं यार, मैं कोई सतयुगी बेटा नहीं हूँ। मैं तो निरा कलियुगी हूँ।”

मैंने हैरानी से उसकी ओर देखा।

वह फिर बोला, “मेरे अपने पापा पिछले कई सालों से गाँव में अकेले जिंदगी गुजार रहे हैं। बूढ़े हो चले हैं। मन तो उनका भी करता होगा कि बेटे के साथ रहें, पोते-पोतियों के बीच हँसें-बोलें, लेकिन मैं उन्हें यहाँ कभी ला नहीं पाया। सच कहूँ तो अब भी नहीं ला सकता।”

उसकी आवाज भर्रा गई। मेरे पास कहने के लिए कोई शब्द नहीं था।

तभी वह फिर बोला, “दरअसल, जो पापा जी आ रहे हैं, वे मेरे नहीं, घरवाली के पापा हैं। उनके स्वागत में कोई कमी रह गई, तो ....!”

#चित्रगुप्त

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