ग़ज़ल
चौके-छक्के हुए पुराने, मार रहे हैं दस्सा-अट्ठा, साहब जुमले घोंट रहे हैं, सुबह-शाम लेकर सिलबट्टा। जिनकी ख़ुशियों की ख़ातिर मैंने फूलों का बाग़ लगाया, डाल रहे हैं वो ही अब मेरी ख़ुशियों की जड़ में मट्ठा। जाओ, मुर्गे रोज़ लड़ाओ, बैठे-बैठे मौज मनाओ, बाप तुम्हारे चले गए हैं, पूरा देश लिखाकर पट्टा। उनका सर कुचले जाने से मैंने कितनी बार बचाया, अब जो मुझको ढूँढ़ रहे हैं, खुलेआम लटकाए कट्टा। सुख की खेती में भाईचारे की फ़सलें भी लहराईं, दुश्वारी ने घोल दिया है हर रिश्ते के मन में खट्टा। झूठी-सच्ची बातें मेरे बारे में फैलाने वालों, मैंने भी तो रख छोड़ा है सब लोगों का काला चिट्ठा। आख़िर कितने नंबर की उम्मीदें इनसे कर सकते हैं, अपनी पीढ़ी ग़लत सबक़ का जमकर मार रही है रट्टा। कर-माफ़ी कर्ज़ा- माफी सारी ले जाकर उनको दे दो, मेरी मज़दूरी के दो पैसे पर भी लगवा दो बट्टा। कार्यकुशलता गई भाड़ में, फूल रही है चमचागीरी, इस आदत ने बैठाया है हर ऑफिस दफ़्तर का भट्ठा। #चित्रगुप्त