हंसना मना है
हंसना मना है...
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गाँव का नाम था फूटकला, वहाँ के निवासी महा कंजूस पंडित बैजनाथ त्रिवेदी को देखकर लगता था मानो सारा फूटकला उनके भीतर समा गया हो। उनकी कंजूसी की ख्याति ऐसी थी कि लोग कहते थे—बैजनाथ जी के घर में दीपक भी सोच-समझकर जलता है कि आज जलना जरूरी है भी या नहीं।
एक शाम, जब आकाश में तारे भी मितव्ययिता का पाठ पढ़ रहे थे और एक-एक करके छिपने की तैयारी कर रहे थे, त्रिवेदी जी के द्वार पर किसी सज्जन ने दस्तक दी। सज्जन का नाम था हरिशंकर मिशिर—लखनऊ में छोटे-मोटे मुकदमे लिखते थे, पर आत्मा में अभी तक गाँव की मिट्टी लिपटी हुई थी।
दरवाजा खटखटाया गया। एक बार, दो बार, दस बार। अंत में भीतर से खँखार की आवाज आई, फिर लकड़ी के चिर्र-चिर्र की, फिर लालटेन की मद्धम रोशनी दिखी। बैजनाथ जी बाहर आए। लालटेन इतनी पुरानी थी कि उसका काँच काला पड़ चुका था और बाती इतनी छोटी कि उसे देखने के लिए झुकना पड़ता था।
हरिशंकर जी ने विनम्रता से कहा, “पंडित जी, रात का वक्त है, पर दो मिनट की मुलाकात का मन था। बचपन में आपके पिताजी से बहुत स्नेह मिला था।”
बैजनाथ जी ने लालटेन ऊँची की, मिशिर जी का चेहरा देखा, फिर बिना कुछ कहे पास के बरामदे में आ गए। चारपाई पर बैठते ही उन्होंने फूँक मारकर लालटेन बुझा दी। अंधेरा इतना गहरा हो गया कि मिशिर जी को लगा जैसे कोई उन्हें अंधे कुएँ में धकेल गया हो।
मिशिर जी ने हँसते हुए कहा, “अरे पंडित जी, तेल बचाने की बात है न? बुझा दिया। कोई बात नहीं, हम भी गाँव के हैं, अंधेरे से डर नहीं लगता।”
बैजनाथ जी ने गला खँखारा, जैसे कोई पुराना खजाना खोल रहे हों, फिर बड़े रहस्यमयी लहजे में बोले, “तेल तो बहाना है मिशिर जी। असल बात यह है कि मैं अंधेरे में धोती खोलकर बैठता हूँ। दिन में कितना ही सलीके से बाँधो, कपड़ा घिसता है, सिलवटें पड़ती हैं। अंधेरा हो जाए तो कौन देखने वाला है? धोती खुली रहे तो हवा लगती है, कपड़ा टिकता है। पिछले दस साल में एक ही धोती है मेरी, वही साबुत है।”
उसके बाद जो सन्नाटा छाया, वह सन्नाटा नहीं, एक तरह का काला शोक था। हरिशंकर मिशिर के भीतर जो कुछ था—लखनऊ की सभ्यता, अदालत की शालीनता, बचपन की स्मृतियाँ—सब एक साथ चूर-चूर हो गया। वे समझ गए कि अब या तो चुपचाप उठकर चले जाएँ या फिर कुछ कहें जिसका कोई जवाब न हो।
उन्होंने दूसरा रास्ता चुना। धीमे से बोले, “पंडित जी, एक बात पूछूँ?”
“पूछिए।”
“धोती तो ठीक है, पर कुर्ता भी खोलकर रखते हैं क्या?”
बैजनाथ जी ने गम्भीरता से कहा, “वह भी खोल देता हूँ, पर आज आप आए हैं न, अतिथि हैं, इसलिए कुर्ता पहने हैं। वर्ना कुर्ते की भी यही गति होती।”
हरिशंकर मिशिर ने एक लम्बी साँस ली, जैसे कोई यमदूत से बचकर आया हो। फिर बड़ी मुश्किल से बोले, “तो फिर मैं चलता हूँ पंडित जी। बहुत अच्छा लगा।”
वे उठे। अंधेरे में टटोलते हुए बाहर निकले। बाहर चाँद निकल आया था। मिशिर जी ने चाँद की तरफ देखा और मन ही मन सोचा—भगवान का शुक्र है, कम से कम चाँद अभी तक कंजूस नहीं हुआ।
उसके बाद बैजनाथ जी फिर से चारपाई पर लेट गए। धोती खोली, कुर्ता भी उतारा, और निश्चिंत होकर सो गए—यह सोचकर कि आज एक और दिन बिना कपड़े घिसे बीत गया।
#चित्रगुप्त
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