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हंसना मना है

हंसना मना है... ************* गाँव का नाम था फूटकला, वहाँ के निवासी महा कंजूस पंडित बैजनाथ त्रिवेदी को देखकर लगता था मानो सारा फूटकला उनके भीतर समा गया हो। उनकी कंजूसी की ख्याति ऐसी थी कि लोग कहते थे—बैजनाथ जी के घर में दीपक भी सोच-समझकर जलता है कि आज जलना जरूरी है भी या नहीं। एक शाम, जब आकाश में तारे भी मितव्ययिता का पाठ पढ़ रहे थे और एक-एक करके छिपने की तैयारी कर रहे थे, त्रिवेदी जी के द्वार पर किसी सज्जन ने दस्तक दी। सज्जन का नाम था हरिशंकर मिशिर—लखनऊ में छोटे-मोटे मुकदमे लिखते थे, पर आत्मा में अभी तक गाँव की मिट्टी लिपटी हुई थी। दरवाजा खटखटाया गया। एक बार, दो बार, दस बार। अंत में भीतर से खँखार की आवाज आई, फिर लकड़ी के चिर्र-चिर्र की, फिर लालटेन की मद्धम रोशनी दिखी। बैजनाथ जी बाहर आए। लालटेन इतनी पुरानी थी कि उसका काँच काला पड़ चुका था और बाती इतनी छोटी कि उसे देखने के लिए झुकना पड़ता था। हरिशंकर जी ने विनम्रता से कहा, “पंडित जी, रात का वक्त है, पर दो मिनट की मुलाकात का मन था। बचपन में आपके पिताजी से बहुत स्नेह मिला था।” बैजनाथ जी ने लालटेन ऊँची की, मिशिर जी का चेहरा देखा, फिर बिना कुछ ...