समीक्षा

पुस्तक - गांधी के राम
लेखक - डॉ अरुण प्रकाश
प्रकाशन- किताब वाले
मूल्य - 300/-
पृष्ठ - 87

वो राम जो शीलवान हैं, धैर्यवान हैं, मर्यादापुरुषोत्तम हैं और वीर भी हैं। वही राम  जन मन के हैं और वही राम जन जन के भी... 'वही राम गांधी के राम हैं।' 

राममय गांधी कहूँ या गाँधीमय राम दोनों की शक्ति इतनी विशाल है कि इसे तोड़ पाने में बड़ी बड़ी शक्तियां विफल हो जाएं। लेकिन एक तरीका था कि दोनों को अलग कर दिया जाय। इसके लिए राम को सांप्रदायिकता का चोला पहनाया गया। उसके बाद गांधी के 'रघुपति राघव राजा राम' को हल्का करके 'ईश्वर अल्लाह तेरो नाम' को बोल्ड कर दिया गया। बिना ये सोचे समझे कि मुखड़े की पहली अर्धाली के बिना अंतरों को कितना भी सजा लिया जाय गीत कभी मुकम्मल नहीं हो सकता? लेकिन नहीं... गांधी को रामहीन करके राम को भी गांधी हीन कर दिया गया। 

एक धड़े ने रामहीन गांधी को पकड़ लिया और दूसरे धड़े ने गांधीहीन राम को । उसके बाद दोनों अपनी अपनी राजनीति को चमकाने में लग गये। इस दुर्घटना का खामियाजा ये हुआ कि न तो गांधी ही जन जन के रहे और न राम ही। 

दिन भर गांधी वादियों के हिंसक कारनामे देखिए या फिर रामनामियों के अमर्यादित छल प्रपंच... एक खेल मुझे हमेशा याद आता है 'बुल फाइटिंग'। जिसमें आदमी को सांड से लड़ाया जाता है। सांड वैसे तो आदमी से लड़ेगा नहीं इसलिए पहले उसे लाल कपड़ा दिखाकर भड़काया जाता है। 

मीडिया ने राम को सांप्रदायिक बना दिया और कांग्रेस ने गांधी को अग्राह्य। प्रस्तुत पुस्तक 'गांधी के राम' में डॉ अरुण प्रकाश ने दोनों को बेहतर ढंग से समझने और समझाने का प्रयास किया है जो कि निश्चित तौर पर पाठकीय आग्रहों के अनुकूल है। 

#दिवाकर


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