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वीथियों के बीच

"हमें उतार दिया जिंदगी ने बीच सफर हमारे पास यहीं तक का ही किराया था"  ******************************** शेर ऐसा ही होता है वो जब दहाड़ता है तो सारा जंगल मूक कोलाहल से भर जाता है।  आदमजात के जीवन का सोलहवां वसंत आते आते उसके अंदर एक लयात्मकता जन्म लेने ही लगती है। यह वो समय होता है जब जिंदगी का शुरूर चढ़ना शुरू होता है। यह समय जीवन में रंगीन सपने देखने का होता है।  इसी समय उसके अंदर की कोमलता काव्यात्मक होने लगती है। जीवन के इस मोड़ पर शायद ही कोई ऐसा हो जिसने  तुकबंदियां न की हो या कुछ न कुछ काव्यात्मक न लिखा हो। उन्हीं में से कुछ विशिष्ट प्रकार के जीवों को कविताएं पकड़े रह जाती हैं, तो वे आजन्म कुछ न कुछ लिखते रहते हैं। कुछ सोलह के बाद दो चार साल में कविता से अपना पीछा छुड़ा लेते हैं। कुछ की कविताई बीवी जान के चप्पलों और जूतों की खातिरदारी के बाद छूटती है। कुछ बड़े ढीठ प्रकृति के होते हैं जो जीवन की किसी भी परिस्थिति में लिखना नहीं छोड़ते ये इस प्रकार के जीव होते हैं जो चाहते हैं कि दुनिया उनके कहे के हिसाब से चले। लयात्मक अभिव्यक्ति की अलग अलग विधाएं हैं उन्हीं से ए...

बड़े साहब बड़े कवि

बड़के साहब बड़के कवि ******************* साहब को कुछ दिन पहले तक संगीतकार बनने की खुजली लगी थी। तभी उन्होंने दो चार तंबूरे मंगवा लिए थे। उसे दो चार दिन ठोंका पीटा बजाया फिर चार छः बार हाथ काट लेने के बाद उन्हें ये अकल आ गई कि संगीत उनके वश का नहीं है।  बड़ा साहब होना कोई इतनी छोटी बात तो होती नहीं है कि वो इतनी आसानी से हार मान लें। उन्होंने थोड़ा सा दिमाग लगाया जो कि है भी उनके पास थोड़ा ही तो कविता के जसामत की शामत आ गई। उन्होंने प्रेम कवियों पर मर मिटने वाली आधुनिकाओं के बारे में बारे में सुन रखा था। इस आकर्षण ने पहले भी उनका जीना हराम किया था लेकिन तब इस बीज में अंकुरण नहीं हो पाया था। समय के हवा पानी से धरती फूटी और अंकुर बाहर निकल आया।  कविताओं की करीब दर्जन भर किताबें मंगाकर उसे हफ्ते भर सिरहाने रखकर सोने के बाद उन्हें इस बात का एहसास होने लगा कि वो कवि ही हैं। फिर क्या था उन्होंने कलम पकड़ ली और सादे कागज का गला घोटने पर उतारू हो गए।  "बड़े साहब कविता लिख रहे हैं।" एक चपरासी ने आकर दफ्तर में सूचना दी।  बड़े बाबू जिन्हें मोबाइल पर कुछ भी लिखना नहीं आता था। उन्...

ग़ज़ल

दिखने में तो सारा सिस्टम बांका छैल छबीला है। लेकिन आधे पुर्जे गायब बाकी आधा ढीला है। कत्लेआम मचाने दिल्ली आएगा फिर नादिरशाह यदि सत्ता का चाबुक पकड़े बैठा शाह रंगीला है। ये कैसी कद की तुलना है मुझको खाईं में रखकर उन्हे जहां पर खड़ा किया है उसके नीचे टीला है। एक रोज था डसा इश्क ने कुछ रिश्तों के जंगल में उसी रोज से आसमान का तेवर नीला नीला है। तितली ने होंठों से छूकर कर डाला सबको बीमार बागों के सब फूलों का रंग तब से पीला पीला है। कितने आशिक पाल रखे हैं एक अदद दिल की खातिर दिल तेरा दिल ही है या फिर कोई गांव कबीला है। अपने चादर के टुकड़ों से बांटा करता हूं रूमाल अश्कों की बारिश होने पर जिसका बाजू गीला है। चित्रगुप्त

परंपरा

तोलनी ब्याह ************* अपने ही देश में एक ऐसी जगह है जहां पहली बार लड़की को पीरियड आने पर जश्‍न मनाया जाता है। यह अनोखी परंपरा असम के बोगांइ गांव जिले के सोलमारी में मनाई जाती है जो कि सालों से चली आ रही है। आज भी इस परंपरा को जारी रखा गया है। यहां जब लड़की को पहली बार पीरियड आता है तो उसके माता-पिता उसकी शादी केले के पेड़ से करवा देते हैं। इस अनोखी शादी को तोलिनी ब्‍याह कहा जाता है।  यह तोलिनी ब्‍याह पीरियड के पहले दिन ही किया जाता है। उसके बाद लड़की को ऐसे कमरे में रहना होता है जहां सूरज की रोशनी न पड़ें। इतना ही नहीं उसे पका हुआ खाना देने की अनुमति नहीं है। उसे केवल कच्‍चा दूध, फल खाने को दिए जाते हैं। पीरियड्स के दौरान उसे जमीन पर सोना होता है और वह किसी का चेहरा तक नहीं देख सकती है।

लघुकथा

मिसमैनेजमेंट ऑफ मैन पॉवर *********************** सरकार को अखबारी संपादकीय से पता चला कि पुलिसिया तंत्र में उच्चाधिकारियों द्वारा कई सिपाही अपनी ही खातिरदारी में लगा कर रख लिए जाने के कारण उनका सही और जरूरी इस्तेमाल नहीं हो पाता है। इसी कारण राज्य में अराजकता का माहौल है।  सरकार ने इस मसले से निपटने के लिए एक तीन सदस्यीय टीम बनाई जिसमे आईजी स्तर के सेवानिवृत्त अधिकारियों को नियुक्त कर दिया।  नियुक्ति के दूसरे दिन ही इन तीनों अधिकारियों के घरों में तीन तीन दरबान, एक फूल देखने वाला एक कुत्ता घुमाने वाला, एक आने जाने वाले लोगों की देखभाल के लिए नियुक्त कर दिया गया। जिसकी संस्तुति तुम भी रखो हम भी रखें की तर्ज पर पुलिस महानिदेशक द्वारा रातों रात कर दिया गया। 

ग़ज़ल

नाम तुम्हारा मंदिर मंदिर चिपकाकर। देखेंगे हम अपनी किस्मत आजमाकर। बेर तुम्हारे हाथों से खाते हैं तो गुदगुदियां होती हैं अंदर में जाकर। पायल, झुमके, कंगन भी तुझको चाहिए मैं तो खुश हूं केवल तुझको ही पाकर। मरने का ही शौक लगा है तुझको तो इश्क मोहब्बत जो मर्जी हो तू जा कर। दिलफेकों को दिल पर काबू दे या फिर तीन चार दिल देकर इनको भेजा कर। लफ्जों के हर तीर कयामत वाले हैं जाने क्या वो बैठे हैं ऐसा खाकर। वो सागर से मिलने को जाएगी ही थक जाओगे तुम दरिया को समझाकर। #चित्रगुप्त 

दो रुपए

दो रुपए ****** ठिठुरन भरी सुबह में ट्यूशन पढ़कर लौट रहे बच्चे एक हाथ अपनी जेब में डाले और दूसरे हाथ से साइकिल का हैंडल सम्हाले झुंड में जोर जोर से बातें करते और ठठ्ठा लगाते जा रहे थे। सड़क किनारे थोड़ी थोड़ी दूर पर घर बने हुए थे। कुछ भैंसें और गायें सड़क के दोनो ओर बंधी हुई थीं। अलसाए  लोग मवेशियों को चारा पानी देते गोबर उठाते इधर से उधर आते जाते दिख रहे थे। औरतें सड़क किनारे बर्तन मांज रही थीं। कुछ छोटे बच्चे साइकिल का टायर छोटे डंडे से मारकर चला रहे थे। शकुन भी उनमें से एक था।  राम सरन पत्नी और मां की हजारों गालियां खाकर अब बिस्तर से उठा था। मुंह फैलाते हुए तीन चार अंगड़ाइयां लेने के बाद उसने अलगनी पर टंगी अपनी पैंट की जेब को खंगाला और खाली हाथ बाहर निकल कर पत्नी से पूछा - "मेरी पैंट की जेब में दो रुपए रक्खे थे तुमने निकाला क्या?" "मैं तुम्हारे पैसे निकालकर क्या करूंगी? तुम हो ही बड़े कुबेर के नाती जो तुम्हारी जेबों में पैसे भरे रहते हैं और मैं उसमे से निकालती रहती हूं।"  "मैने ये कब बोला यार? मसाला खाना था वही ढूढ़ रहा था।" "खाओ मसाला खूब खाओ अभी द...