गली-गली के नारद *************** सुबह सोकर उठा था और अंगड़ाई लेते हुए आँख मिलमिलाने के वास्ते अपनी हथेलियों को तैयार कर ही रहा था कि वे आ गये। "सुना है तुम्हारी सरकारी नौकरी लग गई?" उन्होंने आते ही पूछा। मैंने हां में सिर हिलाया ही था कि उन्होंने दूसरा सवाल दाग दिया। "कितना घूस दिए थे?" ये वाला सवाल असहज करने वाला था। इस देश का आम आदमी गलत कर तो सकता है लेकिन गलत कहना उसे कतई गवारा नहीं। सबूत के तौर पर आप उम्र भर ब्रम्हचर्य पर भाषण देने वाले बाबाओं को ले सकते हैं जिनका बुढापा अनर्गल क्रियाओं के जाल में जेलों में कट रहा है। लेकिन वे आये ही इसलिए थे बंदे को सरकारी मिली है फिर भी उनके जीते जी कोई खुश रहे ये कैसे हो सकता है। मैं अगर उनके इस सवाल से असहज न भी होता तो वे दूसरा पूछ लेते, तीसरा पूछ लेते, चौथा पूछ लेते...। वैसे उनका उत्तर से कोई लेना होता भी नहीं है लेकिन वे सवाल पर सवाल पूछते रहते हैं और चेहरे का तापमान मापते रहते हैं। जब तक सामने वाला उनके सवालों से पूरी तरह परेशान होकर लाल पीला न हो जाए वे मानेंगे नहीं। यहां तरह-तरह के लोग हैं। कुछ लाल, कुछ पीले, क...