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ग़ज़ल

जख़्म ही थे, पिघल गए होंगे शब्द साँचे में ढल गए होंगे लोग कहने लगे निशाने बाज तीर तुक्के में चल गए होंगे शेर मैं तो कभी कहता जो हुए हैं निकल गये होंगे। आपसे इश्क की बातें, ना ना यूँ ही अरमा मचल गए होंगे। फूल कल तक हरे भरे ही थे तुमको देखा तो जल गए होंगे। क्या कहूँ आदमी बदले कैसे? वक्त जैसे बदल गए होंगे। हम किसी काम के नहीं थे बस और क्या था जो खल गए होंगे? #चित्रगुप्त

काले कृषि कानून

"जमूरे! सुना है अपने मोदी जी ने तीनों कृषि कानून वापस ले लिए ?" "ठीक ही सुना है उस्ताद ले तो लिए हैं।" "लेकिन उसके तो बड़े फायदे गिनाए जा रहे थे। फिर ऐसा क्या हो गया कि उसे वापस लेना पड़ा।" "हुआ कुछ नहीं उस्ताद बस मोदी जी को कृषि कानून पास करने से ज्यादा फायदा अपने विपक्षियों को बेरोजगार रखने में नजर आया तो उन्होंने ऐसा कर दिया।" "तो अब विपक्षी क्या करेंगे?" "कुछ और नहीं करेंगे उस्ताद बस आंदोलन को जारी रखेंगे, जहाँ वे पहले सरकार को तानाशाह कहकर कोस रहे थे वहीं अब सरकार के कमजोर होने का सियापा करेंगे।" #चित्रगुप्त 

शिकायत

गांधी वादियों की शिकायत- गांधी जी की बुराई वही लोग करते हैं जो गांधी जी को समझ नहीं पाए। गोडसे वादियों की शिकायत- सावरकर की बुराई वही लोग करते हैं जो सावरकर को समझ नहीं पाए। अलाने वादियों की शिकायत- अलाने की बुराई वही लोग करते हैं जो अलाने को समझ नहीं पाए। फलाने वादियों की शिकायत- फलाने की बुराई वही लोग करते हैं जो फलाने को समझ नहीं पाए। इनकी बातें सुनकर पड़ोस की चाची चिल्ला रही हैं- "मेरे साथ रहकर इन्होंने जिंदगी गुजार दी और ये मुझे ही न समझ पाए। तो इतने बड़े-बड़े लोगों को क्या घंटा समझेंगे??" #चित्रगुप्त

ग़ज़ल

कहता तो हूँ उससे अब छोड़ो जाऊँ लेकिन उसकी लत छोड़े तब तो जाऊँ माँ कहती है सुबह हो गई उठ जाओ मन कहता है मुँह ढककर के सो जाऊँ दुनिया कहती है सीखो दुनिया दारी मेरा मन है ख्वाबों में ही खो जाऊँ। कौन समंदर होने को लालायित है लेकिन कतरा दरिया कुछ तो हो जाऊँ खर-पतवारों में भी कुछ तो होगा ही लाओ इनमें कुछ फूलों को बो जाऊँ #चित्रगुप्त

गली गली के नारद

गली-गली के नारद *************** सुबह सोकर उठा था और अंगड़ाई लेते हुए आँख मिलमिलाने के वास्ते अपनी हथेलियों को तैयार कर ही रहा था कि वे आ गये।  "सुना है तुम्हारी सरकारी नौकरी लग गई?" उन्होंने आते ही पूछा।  मैंने हां में सिर हिलाया ही था कि उन्होंने दूसरा सवाल दाग दिया।  "कितना घूस दिए थे?"  ये वाला सवाल असहज करने वाला था। इस देश का आम आदमी गलत कर तो सकता है लेकिन गलत कहना उसे कतई गवारा नहीं। सबूत के तौर पर आप उम्र भर ब्रम्हचर्य पर भाषण देने वाले बाबाओं को ले सकते हैं जिनका बुढापा अनर्गल क्रियाओं के जाल में जेलों में कट रहा है।  लेकिन वे आये ही इसलिए थे बंदे को सरकारी मिली है फिर भी उनके जीते जी कोई खुश रहे ये कैसे हो सकता है। मैं अगर उनके इस सवाल से असहज न भी होता तो वे दूसरा पूछ लेते, तीसरा पूछ लेते, चौथा पूछ लेते...। वैसे उनका उत्तर से कोई लेना होता भी नहीं है लेकिन वे सवाल पर सवाल पूछते रहते हैं और चेहरे का तापमान मापते रहते हैं। जब तक सामने वाला उनके सवालों से पूरी तरह परेशान होकर लाल पीला न हो जाए वे मानेंगे नहीं। यहां तरह-तरह के लोग हैं। कुछ लाल, कुछ पीले, क...

रामलाल ने कौआ खाया है

रामलाल ने कौआ खाया है(जनश्रुति) **************************** एक बारात वापस लौट रही थी। जंगल का रास्ता था और समय पर वे जंगल पार नहीं कर पाए। रात हो गई तो वे रास्ता भूल गये। अगली सुबह हुई लेकिन दिन भर भटकने के बाद भी उन्हें कोई गांव न मिला। आखिर भूखे प्यासे वे कबतक रहते। किसी तरह उन्होंने एक नदी ढूढ़कर प्यास तो बुझा ली लेकिन अब समस्या खाने की थी। जंगल में कौओं को छोड़कर और कोई पशु पक्षी भी नहीं दिखाई दे रहे थे।  भूख से बिलबिलाते कुछ युवकों ने कौओं को ही मारकर खाने का निर्णय ले लिया। बारातियों में से ही किसी बीड़ी पीने वाले के पास माचिस थी तो उसने लकड़ियां ढूढ़कर आग लगा दी। रात का समय था तो उन्हें कौओं को पकड़ने में भी ज्यादा परेशानी नहीं हुई।  कौवे पकड़-पकड़ कर आते रहे और लोग उसे भून-भूनकर खाते रहे। उन युवकों की देखादेखी धीरे-धीरे सभी बारातियों ने कौवे भूनकर खा लिए लेकिन उन्ही बारातियों में 'रामलाल' भी था जिसने कहा कि चाहे भूख से तड़पकर मर जाऊँ यह स्वीकार है, लेकिन कौआ नहीं खाऊंगा। रात गुजर गई। दूसरे दिन सौभाग्य से चरवाहों की मदद से उन्हें बाहर निकलने का रास्ता भी मिल गया। लेकिन अब समस्य...

रक्षा सौदा घोटाला

रक्षा सौदा घोटाला *************** "जमूरे! हर बार अपने देश के  रक्षा सौदे में कोई न कोई घोटाला क्यों हो जाता है?" "घोटाला नहीं हो जाता उस्ताद ऐसा पश्चिमी देश साजिश के तहत करते हैं। जिसका शिकार विकासशील देश बनते हैं।" "लेकिन इसका फायदा क्या होता है?" "फायदा ये होता है उस्ताद कि इससे विकासशील देशों की सरकारें नए रक्षा सौदे करने में कतराने लगती हैं। जिससे वे अपनी सैन्य ताकत नहीं बढ़ा पाती।" "लेकिन विकसित देश विकासशील देशों को विकासशील ही क्यों रहने देना चाहते हैं?" "ऐसा इसलिए उस्ताद ताकि कुछ गिने चुने देशों की दादागिरी हमेशा कायम रहे और उनके अपने वाणिज्यिक हित सुरक्षित रहें... लेकिन आज आप अंतरराष्ट्रीय सवालों के चक्कर क्यों पड़े हो उस्ताद!" "ओ माई डियर फ्रेंड जमूरे , जब घर-परिवार और अपने आस-पास की हालत बोलने लायक न हो तो आदमी बड़ी-बड़ी बातें करने ही लगता है।" #चित्रगुप्त