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साँप और आदमी

साँप और आदमी ************* झाड़ी में खेल रहे सांप के बच्चे ने अपनी माँ से पूछा- "मम्मी मम्मी एक आदमी इधर ही आ रहा है उसे काट लूँ क्या?" "बच्चे की बात सुनकर नागिन घुड़की... तू बड़ा आया उसे काटने वाला अगर उसने भी पलटकर काट लिया तो?" #चित्रगुप्त 

सास, दामाद और पापड़

सास, दामाद और पापड़ (जनश्रुति) ************************ एक आदमी ससुराल गया... वहां सास ने तरह तरह के पकवान तो बनाये लेकिन दामाद जब खाने के लिए बैठा तो बुजुर्ग सास पापड़ देना भूल गई।  पापड़ को गरम रखने के लिए उन्होंने उसे चूल्हे के ऊपर ही रखकर छोड़ दिया था। वह आदमी जहाँ बैठकर खाना खा रहा था वहां से पापड़ बिल्कुल  सामने रखा हुआ दिखाई भी दे रहा था। लेकिन ससुराल में संकोचवश मांगे तो मांगे कैसे...? फिर आदमी ने दिमाग लगाया और सास से बोला  "सासू माँ आते समय रास्ते में एक बहुत बड़ा सांप देखा..." "कितना बड़ा था बेटा.."  "जो वो पापड़ रखा है वहां से लेकर यहाँ तक... इतना लंबा था।" पापड़ का नाम आते ही सास को पापड़ देने वाली बात याद आ गई। वो सास समझदार दी जो इशारों से ही समझ गई लेकिन हमारे राजनेता और नौकरशाह लोग्स ऐसी सास हैं जिन्हें पापड़ पापड़ चिल्लाती हुई जनता के लिए भी आंय आंय के अतिरिक्त कुछ नहीं है।  #चित्रगुप्त

दो भेंगे

दो भेंगे ****** किसी राज्य में दो भेंगे थे। जिन्हें सब भेंगा भेंगा कहकर चिढ़ाते थे।  वैसे भेंगापन उनका बचपन का दोष नहीं था लेकिन उनकी फितरत ही कुछ ऐसी थी कि किसी ने उन्हें मारकर ऐसा कर दिया था। अब इसे प्रकृति का करामात कहें या मारने वाले कलाकारी कि दोनों में से एक दाहिनी तरफ को भेंगा हुआ और दूसरा बाँयी तरफ... दोनों से ही काम तो कुछ सधता न था इसलिए वे बैठे बैठे बातें बनाते रहते थे। इसपर किसी ने सलाह दे दिया कि जो बैठे बिठाए बातें बनाते रहते हो उसे किसी कागज पर उतार लिया करो तो लेखक बन सकते हो, बस वहीं से इनके लेखक होने की शुरुआत हो गई।  वैसे तो उन्हें लेखक होने का 'ल' भी नहीं पता, लेकिन गाँव से संबंध होने के कारण 'ल' से और भी बहुत कुछ जो भी हो सकता है वो सब उन्हें पता था। इसलिए और कुछ आये न आये वे गालियां बहुत बेहतरीन देते थे जिस कारण अधिकतर आम लोग उनसे बचकर ही रहते थे। हालांकि इलाके के लुच्चे और लफंगे लोगों में उनकी ख्याति धर्म में  अंधविश्वास की तरह फैल गई थी।  'फालतू पंगे कौन ले?' वाले सिद्धांत पर चलते हुए लोग इनसे बहस न करके 'हाँ में हाँ' मिलाने वाले स...

कुत्ता पुराण

कुत्ता पुराण ********** सुना है कि कुत्ते और बच्चे में एक ख़ास गुण होता है कि वह व्यक्ति के अंदर छुपे जलन कुढ़न और ईर्ष्या को दूर से ही पहचान लेते हैं। इसलिए अक्सर देखा होगा कि किसी सुंदर-मुन्दर से दिखने वाले  के पास जाते ही बच्चा रोने लगता है या कुत्ता उसे देखते ही भौंकता है। वहीं इसके विपरीत किसी कांतिहीन आदमी को देखकर भी बच्चा हंसता है और उसकी गोदी में चला जाता है या कोई कुत्ता उसे देखते ही दुम हिलाने लगता है।  इसलिए किसी भी आदमी के व्यक्तित्व परीक्षण के लिए ये टेस्ट एक बेहतर विकल्प हो सकता है। बच्चा तो मनमौजी होता है इसलिए उससे तो ऐसा कोई काम लिया नहीं जा सकता दूसरे देश में बालश्रम निरोधक कानून भी हैं। कोई पुलिस का लफड़ा हुआ तो उनका पाँव पूजते पूजते अपने ही पाँव भारी हो जाएंगे, दूसरे अगर वो बच्चा किसी अतिरिक्त चतुर मम्मी का हुआ तब तो वो ऊदबिलाव जैसे ऐसा रूप दिखाएगी कि आपका सारा परीक्षण धरा का धरा रह जायेगा। पर हां ऐसे किसी काम में कुत्तों को आजमाया जा सकता है। वैसे भी कुत्ते बाकी बहुत सारे काम तो कर ही रहे हैं। एक काम व्यक्ति के चरित्र चित्रण का भी कर देंगे तो कौन सा पहाड़ टूट...

मध्यम वर्ग और सरकारी खैरात

मध्यम वर्ग और सरकारी खैरात ************************ "यार जमूरे! बच्चे को कुत्ते ने काट लिया है, टीका कहाँ लगता है जरा बताओ तो..?" "ये तो अपनी पी एच सी में ही लग जायेगा उस्ताद! बस सोमवार या बीरवार को सुबह आठ बजे पहुँच जाना वहां... वहां तो कोई फीस भी नहीं लगती बस एक रुपये की पर्ची कटानी होती है...  नहीं तो हस्पताल के सामने ही जो मिश्रा जी का मेडिकल स्टोर है वहाँ सौ रुपये देकर भी लगवा सकते हैं। वहाँ कभी भी जाओ लग जाता है।" "लेकिन ये वैक्सीन तो सरकारी ही आती है न, फिर मिश्रा जी को कहाँ से मिल जाती है?" "हस्पताल वाले ही तो कमीशन पर देते हैं उस्ताद और कहीं आसमान से थोड़ी टपकती है।" "जब सामने ही फ्री में लगती है तो फिर मिश्रा जी के यहाँ लगवाने कौन जाता होगा यार?" "वो तो नहीं मालुम उस्ताद!" कुछ दिन बाद फिर से जमूरे की मुलाकात मदारी से हुई, तो उसने पूछ लिया- "कुत्ते वाला टीका बच्चे को लगवा लिया था क्या उस्ताद?" "हां भाई लगवा लिया था।" "कहाँ से लगवाया?" "वही अपने मिश्रा जी के यहाँ से..." "क्यो...

ग़ज़ल

आईना देख देख के शरमाये हुए दिन तेरे बगैर होते हैं मुरझाये हुए दिन। कैसे तेरे बगैर हैं ये बात न पूछो  जख्मों से भरी रात है विष खाये हुए दिन। जब से गए हो खूंटी से लटके ही हुए हैं बिस्तर की तरह बांध के लटकाये हुए दिन जब जब भी तेरी याद में सोती नहीं रातें जमहाइयों में कटते हैं अलसाये हुए दिन। हर ओर घूरने में हैं मनहूस निगाहें सहमें हुए ढल जाते हैं बल खाये हुए दिन। जाना है कहाँ ये भी बताते नहीं हैं कुछ  मंजिल के लिए दौड़ में भरमाये हुए दिन। कर लो हसीन कितनी भी अब वस्ल की रातें भूले से भी भूलेंगे न तरसाये हुये दिन।

हम लड़के

हम लड़के ******** हम भी पैदा ही हुए हैं कोई धरती फोड़कर नहीं निकले या आसमान से नहीं गिरे फिर तुम्हारे अरमान और मेरे प्रान एक ही तराजू में आजू बाजू क्यों रखे हैं? जब पहली बार लड़खड़ाते हुए धरती पर रखा था पाँव और गिर पड़ा था धम्म से फिर भर ली थी सांसें बुक्का फाड़कर रोने के लिए और माँ ने कहा था 'लड़के रोते नहीं हैं।' वो पहली सीख थी आंसुओं को पी लेने की हम रोते नहीं  फिर भी दर्द तो होता ही है न? वक्त के फफोलों के साथ  नदी पहाड़ जंगल चीरकर तुमसे मिलने के लिए मेरा मीलों का सफ़र तुम्हारे इंतज़ार के आगे बौना हो गया। मेरा रोटियां कमाने का जद्दोजहद तुम्हारे रोटियां बनाने से हार गया। अपना पूरा सामर्थ्य लगाकर और अपने सारे सपने भुलाकर भी तुम्हारे सपनों का न पूरा हो पाना  मुझपर एक कलंक सा लगता रहा तुमने मेरा घर अपनाया मैंने तुम्हारे सपने अपनाए पर इबारतें तुम पर लिखी गईं और मुझपर लानतें तुमने अपनी स्वतंत्रता की आड़ में ये मत खाओ वो मत पीओ ये मत पहनो वहाँ मत जाओ समय पर घर आओ उफ कितनी पाबंदियां डाल दी मुझपर बेटियां बाग की तितलियां हैं इन्हें खूब पोसिये पर लड़के भी तो भौंरे हैं इन्हें भी मत कोसिये...